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भारत के बाजार को पूर्ण प्रभावी बाजार बनाना !

क्या भारत में आदर्श पूर्ण बाजार बन पायेगा !

केन्द्र सरकार ने कृषि क्षेत्र के उन्नयन के लिए तीन कृषि सुधार कानून लागू किये हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर लगातार कह रहे है कि कानून किसानों के जीवन में बदलावकारी भूमिका निभाएंगे। वहीं दूसरे कुछ किसान संगठन और किसान इसे कृषि के लिये हानिकारक बता रहे हैं।वे इन कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इस लेख को लिखने का मकसद यह नहीं कि ड्न तीन कृषि सुधारों को वापस लिया जाये या इस को लेकर किसी तरह का दबाव बनाया जाये, बल्कि इस बात की पड़ताल करना है कि केन्द्र सरकार किन उदयों की पूर्ति के लिए एन कानूनों को लेकर आई और किसान किन कारणों से इनका विरोध कर रहे हैं

वर्तमान भारतीय बाजार अनुशासनहीन, अपरिपक्व और अनैतिक, अस्वस्थ प्रतियोगिता से जूझ रहा है। व्यवस्था में पारदर्शिता और ईमानदारी के आभाव में खरीददार और विक्रेता एक दूसरे के प्रति जवाबदेह नहीं है।खरीददार सिस्टम की ड़न खामियों का लाभ उठाते हुए किसान की आय अर्थात फसलों की लागत से खिलवाड़ कर रहे हैं ।कमोवेश यही सियति विक्रेता के लाभ, श्रमिक की मजदूरी, पेशेवर और कुशल लोगों की फीस के साथ होने वाले अन्याय की भी है। यही वजह है कि अधिकांश इन वर्गों के लोगों को खून पसीने की कमाई अनियंत्रित व अपूर्ण बाजार की भेंट चढ़ जाती है। जिससे देश का अच्छा फायदा दे सकने वाला हांचा इसके चलते औसत लाभ और कालांतर नाममात्र के लाभ में तब्दील हो जाता है। जिसके चलते जहां लागत ऊंची है वहीं आय कम है। ऐसी स्थिति में सभी वर्गों के लिए इस बाजार में अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल हो गया है। उसकी जीविका पर संकट है और इस प्रक्रिया में उनके परिवारों व समुदाय का जीवन तबाह हो रहा है। अतः इस बाजार का स्वरूप इस अराजक ढांचे की वजह से रोगग्रस्त हो गया है और एक नासुर बन गया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये सुधार कानून सरकार और नीति-नियंताओं नेक-नियति से तैयार किये गये, जो किसानों के उत्थान के मंशा से लाये गये हैं. लेकिन दिशाहीन बाजार के प्रभावों की आशंका के चलते लोगों खासकर किसानों ने इन सुधारों के नकारना शुरू कर दिया।दरअसल, केन्द सरकार द्वारा लाये गये सुधारों का जब प्रभाव देखा जायेगा तो इनको लाभ किसानों तक पहुंचने से पहले अपरिपक्व बाजार के जरिये उन्मुख होगा।यही वजह है कि इन सुधारों के लाभ का आकलन और प्रभाव अभी नजर नहीं आयेगा।मेरा मानना है कि सरकार को मौजूदा स्सिटम को अगले चार सालों तक यथावत बनाये रखना चाहिए। जिसमें गेहूं, धान और अन्य फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत खरीदर जारी रहे ।इस समय के दौरान किसान सुरक्षित रहेगा, वहीं सरकार, नीति-नियंता, किसार और किसान संगठन इस समय का उपयोग सुभारों का पूर्णतः विश्लेषण कर सकते है।

दरअसल बाजार में जारी अस्वस्थ प्रतियोगिता के चलते खरीददार व विक्रेता समेत हमने ऐसी स्थितियां बनादी हैं कि सेवाओं, परिभ्रमिक, लाभ, आय विभिन्न वर्गो को न्याय संगत ढंग से नही मिल पा रही है। इसके चलते सभी वर्गों की आय में होने वाले नुक्सान की पूर्ति के लिए राज्य और केन्द्र सरकार छूट, सब्सिडी, आर्थिक प्रोत्साहन, ऋण और ऋण माफी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य इत्यादि जैसे कदमों को उठाने को बाध्य है।वहीं सरकार की मंशा है कि लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जाये और वह किसानों के उत्थान के मकसद से कृषिसुधारों को लागू करना चाहती है।हालांकि, इस अपूर्ण बाजार का प्रभाव व कष्ट के कारण किसानों से विमर्श के बाद सामने आ जाते है। सही मायनों में अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष हेतु आदोलन करते हुए किसान इन कानूनों को रद्द करने की मांग कररहे हैं।

दरअसल, यह दोषपूर्ण बाजार देश की तमाम समस्याओं की जड़ में है, जिसके चलते केन्द्र सरकार और किसानों के बीच टकराव की स्थितियों पैदा हो रही हैं।सही मायनों में समस्या किसानों के साथ नहीं है, हकीकत में खरीददार किसी भी वर्ग को लाभ नहीं देने देते। फिर भी सारा दोष खारीददारों को ही नहीं दिया जा सकता, वे भी उसी अपरिपक्व बाजार की परिस्थितियों की देन हैं।आज भारतीय ग्राहक की जेब में पैसा है लेकिन हमारे देश की व्यापार प्रणाली ने उस पैसे को कमाने की क्षमता खो दी है। हकीकत यह है कि आज किसान, व्यापारी, श्रमिक, पेशवर दक्षलोग, व्यवसायिक संस्थान और अन्य वर्ग,जो इस सिस्टम से प्रभावित हैं, वे इससे मुक्ति चाहते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि एक आदर्श पूर्ण बाजार और दोषपूर्ण बाजार की परिभाषा क्या है ? यह भी कि इस दोषपूर्ण बाजार का देश, देशवासियों, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र पर क्या नारान्मक प्रभाव पड़ रहा है।यदि पूर्ण बाजार होता तो क्या साकारत्मक प्रभाव पड़ता यदि दोनों विषयों पर देशव्यापी गंभीर विमर्श सरकारी, राजनीतिक क्षेत्रों, कृषि विशेषज्ञों, विश्वविद्यालयों तथा सेमिनार आदि के जरिये हो तो देश इन सवालों के जवाब हासिल कर सकता है। निस्संदेह इस जटिल प्रश्न का उत्तर तलाशना इतना आसान भी नहीं है। मैं देशवसियों से पूछना चाहता हूं कि क्यों सारा देश एक संपूर्ण बाजार सीपित करने की दिशा में सामूहिक प्रयास नहीं कर सकता।ऐसा बाजार स्थापित करने के लिए बेहतर तालमेल और बाजार के अनुशासन की जरूरत होगी।लगातार मिलकर काम करने से हम बाजार को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं।जो हम सबके लिए लाभकारी होगा।
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